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Tuesday, 5 December 2017

ITC- Sangeet Research Academy- The glorious 40 years...

Considered the “Macca” of Indian Classical Music, Kolkata was all geared up for the ITC SRA’s Annual Music Conference. I was very excited to attend this year’s music conference. I called my guru jee Ustaad Waseem Ahmed Khan and asked him if I could come. He agreed and I could finally be the part of the music conference. 
 This year the music lovers had lost Girija Devi jee, who was a guru at ITC SRA since its inception. So, this year’s ITC Sangeet Sammelan was dedicated to the “Thumri Queen”, as she was called by her fans.
This was a special occasion for SRA as it had completed 40 years of imparting the Indian Classical Music training to several of its scholar. Pt. Ajoy Chakrabarty, Vidushi Subhra Guha, Pt. Arun Bhaduri, Ustaad Waseem Ahmed Khan, Pt Omkar Dadrkar are few names who were its scholar previously and now they are gurus here and are training scholars under them. Ustaad Rashid Khan and Vidushi Kaushiki Chakrabarty are also the product of ITC Sangeet Research Academy. 
Talking about SRA, its one of its kind in the whole country. Its the only one institution who has so many superstars of Indian Classical Music at one place and all of them imparting knowledge under the guru-shishya parampara. I would like to appreciate the efforts of ITC who is trying to save the Indian Classical Music. The rich history of Indian Classical music which is centuries old, needs to be saved and passed on to the future generation and ITC is doing this job beautifully. The rich and glorious history of SRA where a veteran like Pt Ajay Chakrobarty was its first scholar still has its repute of international level.
Talking about Vidushi Girija Devi or Appaji what she was called lovingly by her fan, I would like to quote Javed Akhtar here who said-“Girija Devi was not only a great classical singer but a national treasurer. We are poorer with out her."  Indeed! the indian classical music has become poorer without her. For whole of my life I would regret not listening to her live even once. If she would have been with her today, maybe I could have got the golden opportunity to listen to her live at this year’s ITC SRA’s annual conference.


Tuesday, 7 June 2016

वर्षा ऋतु के रंग मल्हार के संग...

लोग कहते कि जब मियाँ तानसेन राग दीपक गाया करते थे तो दीपक प्रज्वलित होने लगती थी।जब वो राग मल्हार गाया करते थे तो बारिश होने लगती थी।मुझे ये तो नहीं पता कि ऐसा होता था या नहीं किंतु मैं अपने छोटे से संगीत के अनुभव से इतना ज़रूर कह सकता कि अगर आप ऐसा कोई राग किसी दिग्गज की आवाज़ में सुनें तो निश्चित आपको ऐसा लगेगा की दीये जल उठें हों या बारिश हो रही हो।मैं ऐसा बिलकुल नहीं कह रहा की सच-मुच की आग या पानी आपको देखेगी किंतु आपको ऐसा अहसास ज़रूर होगा।
   आज की ही बात ले लीजिए।मैं घर पर बैठकर आज उस्ताद राशिद खान साहब की राग मल्हार सुन रहा था।मुझे विश्वास है जब राशिद खान साहब "बिज़री चमके बरसे" गा रहें होंगे तो उनके मन में निश्चित ही बरसात वाली दिन का पूरा चित्रण होगा।उस राग के कुछ देर बजने के बाद वातावरण में एक अ
उस्ताद राशिद खान
दभुत ठंडक की अनुभूति होने लगी, ऐसा अहसास जैसे अभी कुछ की देर पहले ज़ोरों की बारिश हुई हो। राग मल्हार तो अपने आप में ही बड़ा मधुर और गम्भीर वातावरण पैदा करने वाला राग है, वो भी उस्ताद जी की अदभुत अदायगी इस राग की मधुरता पर चार चाँद लगा रहे थे।राशिद खान साहब रामपुर सहस्वान घराने से आते और इन्होंने अपनी संगीत की तालीम कई दिग्गज कलाकारों से ली है उनमें से उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खान और उस्ताद निशार हूसेन खान प्रमुख हैं।इनकी गायकी के लिए इन्हें पद्मा श्री और भी कई पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।लीजिए मैं राग मल्हार की बात करता-करता उस्ताद जी की बात करने लगा।किंतु आज चर्चा सिर्फ़ और सिर्फ़ राग मल्हार पर उस्ताद जी की बातें फिर कभी।
   तो आइए आज बात करते हैं राग मल्हार की उसकी विशेषताओं की।सुखद संयोग तो देखिये अब जब लोगों को मानसून की पहली झमा-झम बारिश का इंतज़ार है तो ऐसे मैं राग मल्हार की चर्चा तो बनती ही बनती है।
उस्ताद शफ़ी अहमद खान
यह राग हिंदुस्तानी के साथ -साथ कर्नाटिक संगीत में भी गाया जाता है।मधायामावती, नाम से जाना जाता है यह राग कर्नाटिक शैली में।एक बहुत ही ख़ास बात मैं बताना चाहूँगा यहाँ-हमारा राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' भी राग मल्हार में ही गाया गया है।अभी मैं कोलकाता प्रवास कर रहा हूँ और अपने गुरूजी, आगरा घराने के उस्ताद वसीम अहमद खान से तालीम लेने के क्रम में।मौसम ख़ुशनुमा है और बातों बातों में बात राग मल्हार पर चली तो गुरूजी ने उसके बारे में काफ़ी कुछ बतलाया।रामदासि मल्हार,सूरदासि मल्हार,मेघ मल्हार कुछ मल्हार के ऐसे प्रकार हैं जो की काफ़ी प्रसिद्ध हैं इस अदभुत घराना का।मैं यहाँ पर विशेषकर ये बताना चाहूँगा की राग मेघ मल्हार विशेषकर आगरा घराने के गायकों द्वारा गाया जाता है बाक़ी घरानों में इस राग को राग मेघ के नाम से गाया जाता।अगर राग मल्हार की आलपचारी आगरा घराने वालों की हो तो फिर तो क्या कहने! बंदिश की ख़ूबसूरती और भी बढ़ जाती।इतने में गुरुजी ने आगरा घराने की एक ख़ास बंदिश अपनी दमदार आवाज़ में गुन-गुनायी "रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे"-(यह बंदिश उनके गुरूजी उस्ताद शफ़ी अहमद खान साहब द्वारा रचित है)तो चारों ओर बादल ऐसे आ गाये जैसे यह बंदिश उनके लिए आमंत्रण हो।"आए आती धूम धाम" उस्ताद फ़ैयाज़ खान साहब की बहुत ही लोकप्रिय बंदिश है राग मेघ मल्हार में है।
   अब बात करते हैं ग्वालियर घराने की।ग्वालियर घराने की संगीत परम्परा तो सदियों पुरानी है।राजा मानसिंह तोमर या उससे पहले से ही चली आ रही इस घराने ने कई नायाब संगीतकार दिए हमारे देश को।बैजू बावरा, कर्ण और महमूद जैसे दिग्गज इसी घराने से आते।इन तीनों ने हमें एक नई प्रकार की मल्हार दी जो की बिक्शु की मल्हार, धोन्डिया की मल्हार और चाजू की मल्हार के नाम से मशहूर हुई।  ग्वालियर घराने के उस्ताद अब्दुल रशीद ख़ान की आवाज़ में राग ग़ौड मल्हार में "बादर बरसवे बरसात" से मन को एक ग़ज़ब की अनुभूति हुई।इस महान संगीतकार के तो बारे में क्या कहूँ।अपनी १०८ वर्ष की गौरवमयी जीवन में ४००० ठुमरियों से भी ज़्यादा ठुमरियाँ रची है इन्होंने जिसके कारण इन्हें रसन पिया के नाम से भी जाना जाता।
पं अजय चक्रबर्ती

           मेरी इस राग में और रुचि बढ़ी तो ढूँढते ढूँढते  मैं पटियाला घराने के पंडित अजय चक्रवर्ती की मधुर आवाज़ में राग मल्हार के झपताल में गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’ और उसके बाद द्रुत लय तीनताल में निबद्ध पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष की रचना- ‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’ तक पहुँच गया।सच मुच वातावरण में एक बरसात की ठंडक की एहसास होने लगी इन दोनों की आवाज़ सुन कर।

राग मल्हार तो ऐसा राग है जिसपे जितनी चर्चा की जाए कभी ख़त्म ही ना हो।आगे मिलेंगे और राग मल्हार के प्रकार और उनमें कुछ ख़ास बंदिशों पर चर्चा करेंगे। अभी तो वर्षा ऋतु की आगाज ही हुई है।













Friday, 27 May 2016

आज बातें कुछ सदाबहार गानों की...

मेरे लिए संगीत का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत होता था।कई लोगों ने मुझे कहा कि फ़िल्मी गीत भी गाऊँ।पर मैं तो बस शास्त्रीय संगीत में ऐसा रच-बस गया था कि कुछ और सुनने का भी मन नहीं करता था।
आज सुबह जब मेरी आँखें खुली  तो मुझे एक बहुत ही मधुर आवाज़ में "हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते" सुनने को मिला।

बेगम परवीन सुल्ताना
सच -मुच इस गाने को सुन कर मुझे इस गाने से प्यार हो गया था।बाद में यह पता चला की इस गाने के संगीतकार आर डी बर्मन थे और यह गाना फ़िल्म क़ुदरत से था।इस गाने को और किसी ने नहीं बल्कि पटियाला
घराने की विख्यात गायिका बेगम परवीन सुल्ताना ने गाया है। मुझे आज भी याद है जब मैं आज से ४ वर्ष पहले आईटीसी एसआरए के वार्षिक सम्मेलन में बेगम साहिबा को लाइव सुन रहा था तो लोग किस तरह इस  को सुनने की फ़रमाइश उनसे कर रहे थे।उनके महज़ इस गाने को गुन-गुनाने से पूरी महफ़िल की फ़िज़ा ही बदल गयी थी।हमें तुमसे प्यार कितना गाने को किशोर कुमार जी ने भी गाया है जो कि काफ़ी लोकप्रिय हुआ है।बाद में मैंने हिंदी फ़िल्मों के गाने के बारे में जानकारी इकट्ठा करनी शुरु कर दी।तो चलिए आज हमलोग वैसे गानों में डूबते हैं जो की काफ़ी हद तक शास्त्रीय संगीत और इसके  रागों पर आधारित हैं।अब फ़िल्मों की गानों की बात हो तो भारत रत्न लता मंगेशकर जी का नाम ख़ुद ब ख़ुद ज़हन में आता।

भारत रत्न लता मंगेशकर जी
लता मंगेशकर,ये नाम  सुनते ही कानों में एक मीठी,मधुर,सुरीली आवाज़ गूँजने लगती है।न जाने कितने सूपरहिट
गानें दिए इन्होंने संगीत जगत को।फ़िल्म सीमा से "मनमोहना बड़े झूठे "जिसमें शंकर जयकिशन जी ने राग जयजवंती को बख़ूबी इस्तेमाल किया है जो की गाने की सुंदरता को और भी बढ़ाता है।राग बागेश्वरी में राधा ना बोले रे फ़िल्म आज़ाद से,राग भोपाली में ज्योति कलश चलके -भाभी की चूड़ियाँ फ़िल्म से और न जाने कितने ऐसे गाने गाएँ होंगे लता जीं ने अपनी मधुर आवाज़ मे ।रफ़ी साहब की आवाज़ में "मधुबन में राधिका नाचे रे"जो की राग हमीर पर आधारित है ,के न जाने कितने लोग दीवाने होंगे।अक्सर लोग इस गाने को गुन-गुनाते मिल जाएँगे आपको।अगर बात करूँ में मन्ना डे साहब की तो फ़िल्म नरसि भगत में उनके और हेमंत कुमार जी द्वारा गाया गया "दर्शन दो घनश्याम' सुनते ही मन में एक गजब की रुहानियत पैदा होती  है।मन्ना डे साहब की राग अहिर भैरव में "पूछो ना कैसे मैंने रैन बितायी'  जो की फ़िल्म "मेरी सूरत तेरी आँखें",की चर्चा किए बिना में मैं कैसे आगे बढ़ सकता।वाह! क्या संगीत दी थी एस डी बर्मन और मन्ना डे की जोडी ने।
रफ़ी साहब

राग मल्हार में गाया गया "गरजत बरसत सावन आयो रे" सुमन कल्याणपुर और कमल बारोत जो की बरसात की रात (१९६०)फ़िल्म से है।इसे भी लोगों ने काफ़ी पसंद किया है।                                                        
              इंद्रधनुशी आवाज़ में रंगी रामपुर सहस्वान घराने के उस्ताद राशिद खान साहब के आवाज़ में "आओगे जब तुम सजाना"गाने की तो बात ही न पूछये।इतनी दमदार आवाज़ में गाया हुआ यह मधुर गीत मन में एक अजीब शकुन पैदा करता है।यह गाना फ़िल्म जब वी मेट से है।
     ये विडम्बना तो देख़ये ये लोकप्रिय गाने हर कोई गुन-गुनाते मिल जाएँगे और साथ में ये मिथक पाले की शास्त्रीय संगीत को समझना और सुनना उनकी बस में नहीं है।

 संगीत की संगत तो अदभुत रुहानियत का एहसास देती है जहाँ रुहानियत हो उसे समझा नहीं एहसास किया जाता,डूबा जाता आनंद आनंद लिया जाता इसके राग -रागीनियों की ।समझ तो बाद में आनी ही है।।



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Sunday, 1 May 2016

आज केवल राग में डूबना है-झूमना है !

Pt Jasraj
रविवार की सुबह अन्य दिनों के सुबह से काफी अलग होती है. ये सुबह कोलाहल से दूर संगीत के रियाज़ और सुबह के रगों में खोने का होता है . इस सुबह न मम्मी की गुस्से में ये आवाज़ आती की "जल्दी करो स्कूल के लिए लेट हो जाओगे" न ही जल्दी तैयार होने की जल्दी होती है. इस तरह सूर्योदय के साथ मेरी सुबह की रियाज़ की शुरुआत होती.

खुद के रियाज़ के बाद जब मैं अपने सी.डी के संकलनों से कुछ गाने सुनता तो मन झूम उठता है। जानते हैं, आज भोर की शुरुआत राग भैरव से हुई. आपको पता ही होगा कि इस राग को पहला राग भी माना गया है.
ऐसी मान्यता है की जब भगवान शिव हिमालय पर बैठ कर ध्यान कर रहे थे तो उनके मन में राग भैरव ही चल रहा था . राग भैरव हो और वो भी पंडित जसराज के मधुर आवाज़ में और वो भी " मेरो अल्लाह मेहरबान " जैसी बंदिश हो तो सुबह की बात ही कुछ और होती है.
Ustad Rashid Khan
                                                                                                          पंडित जसराज की आध्यात्मिक आवाज़ मेरे भीतर एक अदभुत रूहानियत पैदा करती है. मुझे लगता है कि हर किसी को ऐसा होता होगा। पंडित जसराज जी की आवाज़ में इस राग को सुन कर मन को बहुत सुकून मिलता.

 राग भैरव के बाद राग तोड़ी की बारी आती है . उस्ताद राशिद खान के दमदार आवाज़ में इस राग का मजा ही कुछ और है. राग तोड़ी एक ऐसा राग है जो किसी तनाव ग्रस्त इंसान को भी खुश कर सकता. " अब मोरी नइयां " बंदिश सुनकर ऐसा लगता है मानो यह राशिद खान के गले के लिए ही बना हो. उस्ताद जी रामपुर-सहसवान घराने से आते हैं . ये घराना अपने तान कारी और तराने के लिए विख्यात है.

सुबह में अगर गाना सुने और भारत रत्न  पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ ना सुने तो ऐसा लगता जैसे कुछ बाँकि रह गया हो.राग
Pt Bhimsen Joshi
 जौनपुरी में " पायल की झंकार " बंदिश , पंडित जी की आवाज़ में बहुत अच्छी लगती है मुझे. राग जौनपुरी से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. इस राग में ज्यादा बंदिशें श्रृंगार रस में होती.


 परंपरा के अनुसार अंत तो हमेशा राग भैरवी से ही होता है और भैरवी  हो मेरे गुरु जी आगरा घराने के उस्ताद वसीम अहमद खान की सधी हुई , मधुर और दमदार आवाज़ में बंदिश " बनाओं बत्तियां चलो काहे हो झूठी " हो तो सच में रविवार की शुरुआत इससे अच्छी हो ही नहीं सकती . राग भैरवी को सुन के मन को एक अजीब सी शांति मिलती है.
Ustad Waseem Ahmed Khan
 "बाबुल मोरा नैहर छूटा जाए " इस राग में एक प्रसिद्ध फिल्मी गाना है.


सुर, ताल, राग , रागनियों में डूबा रविवार का भोर, सच में  एक अलगअनुभूति देती है !

Music Has No Boundaries...

One thing which can’t be stopped from travelling to a different country without a visa or passport is- Art and Music. I will talk about ...