Thursday, 8 September 2016

सपने सच होते हैं...

मैं क्या गाऊँ?  कैसे गाऊँ?  कुछ समझ नहीं आ रहा।और ऐसा हो भी क्यों ना? आख़िर इतने बड़े-बड़े संगीत के दिग्गज जो सामने बैठे हैं। यह किसी सपने से कम नहीं।पंडित नरेंद्र नाथ धर, पंडित ओमकर दादरकर, उस्ताद अकरम खान और मेरे गुरु जी उस्ताद वसीम अहमद खान जैसे दिग्गज मेरे सामने बैठे हैं और इस से भी बड़ी बात तो यह की यह सब अपनी प्रस्तुतियाँ इसी मंच पर देंगे जिसपर अभी मैं बैठा हूँ।मैं गाने बैठा हूँ और मेरे साथ संगत कर रहे तबले पर पंडित संजय अधिकारी और हार्मोनीयम पर पंडित हिरणमय मित्र।बचपन से ही मैंने इन्हें पंडित अजय चक्रबर्ती,कभी विदुषी गिरजा देवी,तो कभी अपने गुरु जी के साथ संगत करते देखता आया हूँ।आज ऐसा लग रहा था जैसे मेरा बचपन से देखा हुआ सपना सच हो रहा हो।वो सपना जो मैं हर-बार देखता था जब भी किसी बड़े संगीत के कार्यक्रम में जाया करता था।हमेशा सोचता था क्या मैं भी कभी ऐसे गा पाउँगा? आज लग रहा था वो सब सच होने वाला था।
    आज मुझे कलाम साहब की कही हुई -"आपका सपना सच हो, इसके लिए जरूरी है कि आप सपना देखें।" पंक्ति का अर्थ समझ आ रहा है।अगर कोई सपना देखे और उसके अनुरूप कार्य करे तो निश्चित ही वह पूरा होगा।छोटे शहर-क़सबे से होना किसी भी तरह से रुकावट नहीं बन सकता।अब देख़ये न अभी-अभी रीयो अलिम्पिक्स ख़त्म हुआ है और दीपा कर्मकार जैसी जिमनास्ट जिसने दुनिया भर में ख़ुद की पहचान बनाई,आती हैं भी तो कहाँ से? त्रिपुरा से! एक सुदूर, उत्तर-पूर्वी राज्य,एक ऐसा राज्य जिसे पिछडा राज्य माना जाता।किंतु क्या उस पिछड़े राज्य से होना कहीं भी दीपा के लिए रुकावट बना?
    अब आइए संगीत की दुनिया से बात करें तो शायद ही ऐसा कोई होगा जो उस्ताद बिस्मिल्ला खान को नहीं जनता होगा।ऐसा व्यक्ति जिसने शहनाई जैसे वाद्य को दुनियाभर में केवल पहचान ही नहीं दिलाई बल्कि लोगों का उस वाद्य के प्रति नज़रिया भी बदल दिया।क्या आप जानते हैं इनकी जन्म भूमि क्या थी?ये और कहीं नहीं बल्कि बिहार के छोटे से ज़िले डुमराव से थे।क्या इनके लिए भी छोटे,अविकसित ज़िले से होना कहीं भी बाधा बना?
   एसे अनेकों उदाहरण हैं कितने गिनाओ? ये बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं अगर आप किसी बड़े ख़ानदान से हैं, किसी बड़े जगह से हैं तब ही आप इन क्षेत्रों में कामयाब हो सकते।जरुरत है तो बस लोगों को अपनी नज़रिया को बदलने की। आज मैं अपने कक्षा के कुछ मित्रों से बात कर रहा था की वो आगे अपनी जिंदिगी में क्या सपने देखते हैं तो मैंने यह पाया ज़्यादातर लोग डॉक्टर,इंजिनीर जैसे परम्परागत क्षेत्रों में जाना चाहते।लोगों के बीच एक ऐसी अवधारणा है केवल यही सब हैं जिनमे जा कर बच्चे कामयाब हो सकते।आज कल के विद्यालयों से कई आईआईटियन्स,डॉक्टर निकलते लेकिन मैं पूछता हूँ क्यों नहीं कोई संगीतकार,पेंटर,डान्सर,लेखक निकलता? ऐसा इसलिए कि ज़्यादातर विद्यालयों में इन सब विधाओं पर ध्यान और प्रोत्साहन  नहीं दिया जाता।
   मैंने हाल में ही यूटूब पर एक विडीओ देखा जिसमें श्री राजदीप सरदेसाई बिहार का दौरा कर रहे हैं और उन्होंने बिहार के किशोरों से भी बातें की।मुझे जान कर आश्चर्य हुआ कि यहाँ भी सभी सिर्फ़ परम्परागत कैरियर में आगे जाना चाह रहे हैं।ऐसा कोई नहीं जो संगीत,नृत्य,लेखनी,अदाकारी जैसे विधाओं में आगे जाना चाहता हो।अगर कोई इन सब विधाओं पर ध्यान नहीं देगा तो आगे चल कर ये सब समाज से विलुप्त हो जाएँगी।जरुरत है तो वैसे किशोरों को बढ़ावा देने की जिनमे कुछ भी ईश्वर प्रदत हुनर मौजूद हों।उन्हें सही मार्गदर्शन प्रदान करनी की जिससे उन्हें ऐसा लगे कि इन विधाओं में भी आगे बढ़ा जा सकता है, कुछ किया जा सकता है।
        आज जब हमारे प्रधान मंत्री "कौशल विकास" को ले कर काफ़ी सक्रिय हैं तो मैं पूछता हूँ क्या किशोरों में मौजूद ईश्वर प्रदत कौशलों को विकसित करने की ज़रूरत नहीं? क्या उन्हें सही दिशा, मार्गदर्शन देने की ज़रूरत नहीं? आख़िर इन सब को कौशल विकास में क्यों नहीं सम्मलित जाता? यक़ीन मानये अगर किशोरों के हुनरों को सही दिशा दी जाए तो हमारे देश के भी खाते में कई अलिम्पिक पदक आ सकते हैं।हमारे देश से और भी कई अमृता शेरगिल जैसे पेंटर निकल सकते।
 जब मैं रीऐलिटी शोज़ देखता तब पता चलता की हमारे देश मैं कई हुनर मौजूद हैं।लेकिन यहाँ भी ज़्यादातर रीऐलिटी शोज़ सिर्फ़ फ़िल्मी गानों के लिए होते।शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए तो कोई मंच ही नहीं।
   यहाँ मैं आई॰टी॰सी॰एसआरए का ज़िक्र करना चाहूँगा। आईटीसी जो की मुख्यत एक सिगरट्टे बनाने की कम्पनी है उसने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी और ऐसी विधाओं को बढ़ावा देने के लिए एक संगीत गुरुकुल खोल रखा है जिसमें भारत के कई दिग्गज गुरु पं अजय चक्रबर्ती से लेकर विदुषी गिरजा देवी, मेरे गुरु जी उस्ताद वसीम अहमद खान से ले कर पं ओमकर दादरकर तक, जैसे गुरु कई संगीत में रुचि रखने वाले बच्चों को तालीम दे रहे हैं।तो मैं पूछता हूँ बाक़ी कम्पनियों को क्या इन विधाओं को बढ़ावा देने के लिए ख़ास कर छोटे शहरों में खुल कर आगे नहीं आना चाहिए?
आज कल छोटे शहरों में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम न के बराबर होते हैं।ऐसा नहीं है की मैं सिर्फ़ संगीत की बात कर रहा स्पोर्ट्स,पेंटिंग,नृत्य सब विधाओं की कुछ ऐसी ही स्थिती है।
   इस तरह की विधाओं के प्रति प्रत्येक परिवार, समाज,विद्यालय और सरकार इन तमाम स्तरों पर सोच बदलने की अवयस्कता है और किशोरों में ईश्वर प्रदत इन कौशलों को तराशने के लिए सही दिशा, सही मार्गदर्शन, वातावरण और आधार भूत संरचना देने की आव्यशक्ता है ताकि अपने सपनों को साकार करने की दिशा में एक विश्वास के साथ क़दम आगे बढ़ा सकें।यक़ीन मानिए अगर आपके पास सपना है,जुनून है,अनुशासित रियाज़ या अभ्यास है आपको अपने सपने को साकार करने में कोई बाधा नहीं बन सकता।सपना और जुनून बिना किसी संरक्षण के आदि काल में भी साकार हुए हैं। हाँ मैं बात कर रहा हुँ महाभारत काल के महान धनुनर्ध एकलव्य की।हाँ ये सत्य है की शून्य से शिखर तक की यात्रा को काफ़ी दुर्गम डगर से गुज़रना परता है।
  और देख़ये कलाम साहब, जिन्हें मैं अपना आदर्श मानता उन्होंने ने भी ऐसा ही कुछ कहा है-
   "मेरा संदेश, खास तौर पर युवा पीढ़ी के लिए यह है कि उनमें हिम्मत हो कि वह कुछ अलग सोच सकें, हिम्मत हो कि वह कुछ खोज सकें, नए रास्तों पर चलने की हिम्मत हो, जो असंभव हो उसे खोज सकें और मुसीबतों को जीत सके और सफलता हासिल कर सके।।"

Sunday, 28 August 2016

From Gwalior to Agra...From Sarod to Tabla---A day Unforgettable

Birth anniversary celebrations are always special and they become more special when it’s the 100th birth anniversary celebrations. So, when it comes to the celebration of the centenary birth anniversary of Late Sangeet Bhaskar Rajkumar Shyamanand Singh,well known personalities from the music fraternity came together under one roof for a special show. The event started with the garlanding of Sangeet bhaskar's big portrait kept on the stage. People started rendering their homage and respect to the large portrait. 
   It was a great privilege for me being a great grandson of baba (Rajkumar Shyamanand Singh) I got an opportunity to pay my musical tribute to him. The musical events of the day started with me rendering raag bhairav. I sang two bandishes in this raag "prabhu charan tore aayo" in jhaptaal and "jag jag jagga" in drut teentaal. And now finally the time came when people would hear the maestro, Pt Omkar Dadarkar live on the show. In his sweet and melodious voice he started with raag miyan ki todi. The mellifluous singing of Pandit was enough to take the listeners in a musical trance.In modern day very few people are seen continuing their traditions Pt Omkar Dadarkar is one of them,taking the musical legacy of his guru Pt Ulhas Khasalkar successfully to the next generation. He ended his mesmerising performance with the very famous bhajan "baje re muralia baje".
The accomplished Sarod player Pt Narendra Nath Dhar was next to spellbound the music lovers. He being accompanied by the tabla maestro Ustad Akram Khan was a perfect combination to struck the listeners in a soothing musical storm. He performed raag aashavri. Now it was 2 in the afternoon and the musical session came to a halt for the lunch.
    The evening session kickstarted with the magic of the icon of ajrara gharana Ustad Akram Khan on tabla. The very special compositions of his gharana being played by him flowlessly compelled the listeners to move their heads and feet on his tabla beats.The audience were still in awe when the Ustad's performance ended and then the Ustad was followed by the another Ustad of Agra gharana. Yes!! I am talking of Ustad Waseem Ahmed Khan. Being  from the great lineage of agra gharanians Ustad's singing was enough to take the whole event to the next level. The jam packed auditorium, the pin drop silence, the expressions of music lovers wanting to never stop the wonderful evening was a clear symbol that the program was already a grand success. Ustad Waseem Ahmed Khan sang the beautiful "kaun gat bhaiye"in bageshwari  followed by two compositions in megh malhar "rim jhim rim jhim meha barse" and "aaye aati dhum dham", the two very famous bandishes of the agra gharanians. Finally the musical day came to an end with "bano baatiyan kahe ko jhuti" in raag bhairvi by the Ustad.. An unforgettable day for the music lovers of this small town Purnea has ended.
   The program won't had been to the level if these artists were not been accompanied by such great accompanists. The wonderful accompaniment of Pt Sanjay Adhikari on tabla, the melodious accompaniment of Ustad Sarwar Hussain on Sarangi and the mesmerising accompaniment of Pt Hiranmay Mitra on harmonium were a key factor to turn the event into a GRAND EVENT. To add to the event was the presence of Padma Shri Gajendra Narayan Singh, a well known musicologist from Bihar.


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Ustad Waseem Ahmed Khan
Ustad Akram Khan and Pt Narendra Nath Dhar

                                                                                                                  


Pt Omkar Dadarkar


Wednesday, 24 August 2016

आज बातें ग्वालियर घराने की...

आज मेरी सुबह हुई उस्ताद अब्दुल रशीद खान की "काहे को गरबा किनो" ठुमरी के साथ।वैसे तो इन्होंने ४००० ठुमरियाँ से ज़्यादा की रचना की लेकिन यह ठुमरी उनमें से सबसे ज़्यादा लोकप्रिय ठुमरियों में से एक है।"रसन पिया" के नाम से मशहूर उस्ताद अब्दुल रशीद खान ख़याल और ठुमरी के साथ-साथ ध्रुपद और धम्मार भी गाया करते थे।इन्होंने अपने संगीत की तालीम उस्ताद बड़े यूसुफ़ खान और उस्ताद छोटे यूसुफ़ खान से ली थी और उस्ताद अब्दुल  रशीद खान हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरातन घराना "ग्वालियर" घराने से आते थे।इनको अपने १०८ वर्ष के जीवन में कई पुरुष्करों से नवाज़ा जा चुका है।आई॰टी॰सी अवार्ड,संगीत नाटक अकैडमी अवार्ड,रस सागर अवार्ड,पद्म भूषण ये सारे अवार्ड इन्होंने अपने १०८ वर्षीय संगीतमय जीवन में प्राप्त किए।एक और ख़ास बात बताना चाहूँगा यहाँ उस्ताद अब्दुल रशिद खान सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति हैं जिन्हें पद्म भूषण से
सम्मानित किया गया हो।
इसी वर्ष १६ फ़रवरी को इनका देहांत हुआ।अपनी जिंदिगी के आख़री क्षण तक itc sra में गुरु के दायित्व का निर्वाह करते रहे।वैसे तो मैंने इन्हें कभी सामने से नहीं सुना किंतु इनके दर्शन ज़रूर हुए थे जब आज से ४ वर्ष पूर्व SRA के सालाना संगीत सम्मेलन में गया था।
   इस वर्ष केवल इन्हें ही नहीं खोया हमने बल्कि इसी घराने की एक और विदुषी ने भी हम से हमेशा के लिए विदा ले ली।जी हाँ! मैं बात कर रहा हुँ विदुषी वीना सहस्रबुद्धे की।वो भी इसी अदभुत घराने "ग्वालियर घराने" से आती थीं।वैसे इनकी गायकी में कुछ हद तक जयपुर और किराना घराने की भी छाप दिखाई देती थी।इन्होंने अपनी संगीत की तालीम पद्मश्री बलवंतरि भट्ट,पं वसंत ठाकर और पं गजानन राउ से ली थी।ख़याल के साथ-साथ भजन के लिए भी जानी थी विदुषी वीना सहस्रबुद्धे।इनकी गायकी के लिए इन्हें कई पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है जैसे-राष्ट्रीय संगीत नाटक अकैडमी पुरस्कार,उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकैडमी अवार्ड।इन्होंने अपनी गायकी से कई बड़े संगीत सम्मेलनों में लोगों को अभिभूत किया है।२९ जून २०१६ को इन्होंने हमलोगों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
  देख़ये ग्वालियर घराने की दो दिग्गजों की इतनी बातें की मैंने तो थोड़ी बातें तो ग्वालियर घराने की भी बनती है।इस घराने के जन्मदाता उस्ताद हससु खान,उस्ताद हद्दु खान के दादा पिरबक्स को कहा जाता है।ग्वालियर घराने की गायकी की मुख्य विशेषतायें में खुली आवाज़ में गायन,ध्रुपद अंग से मिलती जुलती गायकी,सीधी-सपाट तानों का प्रयोग,तानों में
गमक का प्रयोग; आती हैं।इस घराने में हमारे देश को कई नायाब संगीतकार दिए।पं विष्णु दिगम्बर पलूसकर,पं गुरुराउ देशपांडे,कृष्णराउ शंकर पंडित,उस्ताद फ़तह अली खान सब इसी घराने की देन है।अगर आज के संगीतकरों की बात करूँ तो विदुषी मालिनी रजरकर,पं विनायक टोरवि,मीता पंडित जैसे दिग्गोजों का नाम स्वतः ज़ेहन में आता है।अगर ग्वालियर घराने की बातें करता रहूँ तो शायद यह कभी ख़त्म ही ना हो।लेकिन आज बस इतना ही।अगली बार फिर संगीत पर बातों का सिल-सिला जारी रहेगा।।

Saturday, 20 August 2016

जानिये एक ऐथलीट तबलवादक को...


हाल ही में कोलकाता जाना हुआ। वहाँ मेरे गुरु जी उस्ताद वसीम अहमद खान रहते हैं। गुरु जी इस दफ़े मुझे ख़याल गायकी की बारीकियों से अवगत करा रहे थे। 


जिस दिन मैं गुरु जी के घर गया था, उस दिन कोलकाता में रिमझिम बारिश हो रही थीं, जिस वजह से मौसम ख़ुशनुमा बना था। इसी दौरान गुरु जी के घर एक मस्त और हरफ़नमौला व्यक्तित्व के धनी संजय अंकल (पं संजय अधिकारी) पहुँचते हैं। 


संजय अंकल के तबले की थाप मैंने कभी विदुषी गिरजा देवी तो कभी पं अजय चक्रबर्ती तो कभी मेरे गुरु जी उस्ताद वसीम अहमद खान तो कभी पं ओमकार दादरकर के साथ सुनी है। लेकिन मुझे उनका तबला वादन जितना खिंचता है उतना ही उनका व्यक्तित्व भी। वजह है उनका 'स्पोर्ट्स मेन नेचर'। 

इस बार लगभग ५ वर्षों के बाद उनसे मुलाक़ात हुई।  वे  इस बार भी उतनी ही ऊर्जा से लैस थे और हाँ, वही मुस्कुराहट उनके चेहरे पर तैर रही थी। यह सब गुण खिलाड़ी का होता है और हो भी क्यों नहीं, दरअसल संजय अंकल एथलीट हैं। आप चौंक गए न ! 

आज  जब पूरी दुनिया ओलम्पिक में खोई है तब यह बताना ज़रूरी है कि मशहूर तबला वादक संजय अंकल धावक भी रहे हुए हैं और राज्य स्तरीय और ज़िला स्तरीय प्रतिस्पर्धा में भी अपनी छाप छोड़ी है।


मुझे लगता है कोई भी साधना हो संगीत हो,स्पोर्ट्स हो,नृत्य हो या अन्य कोई विधा हो।किसी में भी शिखर पर पहुँचने के लिए एकाग्रता तो चाहिए ही चाहिए।

 संजय अंकल से जब बात होने लगी तो उन्होंने कहा कभी ख़ुद भी नहीं सोचा था कि संगीत में आएँगे।वैसे वो संगीत में आएँ भी क्यों ना?
आख़िर सब के नसीब में कहाँ होता पं कुमार बोस जैसा गुरु?  इन्होंने अपने तबले की तालीम की शुरूआत श्री आशीष रॉय चौधरी से की थी।और आज इन्हें आप हिंदुस्तान के शीर्षथ कलाकारों के साथ संगत करते पा सकते हैं।विदुषी गिरजा देवी,उस्ताद मशकूर अली खान,पं उल्हास खसालकर जैसे दिग्गज के साथ इन्हें संगत करने का सोभाग्य प्राप्त है।१९९६ में इन्हें "तालश्री" पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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Tuesday, 26 July 2016

'संगीत के पुजारी 'बाबा श्यामानन्द सिंह



मैंने बहुत सारी बातें की आज के कलाकारों पर,बहुत सारे पोस्ट लिखे उन लोगों पर और आगे भी उन पर चर्चा करता रहूँगा,लिखता रहूँगा।किंतु,आज मैं आपलोगों को ले चलता हुँ आज से १०० वर्ष पूर्व।तारीख़ २७ जुलाई का साल १९१६ और स्थान चम्पानगर में जन्म लिया एक महान बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति ने।एक ऐसा मानव जो गायक था ,साधक था,खिलाड़ी था,शिकारी था,जिसमें करुणा और संवेदना भी भरपूर थी।गाना उनके लिए पेशा न था, वव्यवसाय न था,संगीत तो उनके लिए बस एक जप था,तप था।जी हाँ मैं बात के रहा हुँ स्वर्गीय राजकुमार श्यमानंद सिंह की।आज उनकी शताब्दी जन्म तिथि मनायी जा रही है।उनके बारे में जितना सुनता हूँ उतना और ज़्यादा जान ने की इच्छा होती है।उन्होंने अपनी संगीत की तालीम उस्ताद भीष्मदेव चैटर्जी,पं भोला नाथ भट्ट,उस्ताद बच्चू खान जैसे तत्कालीन दिग्गजों से ली थी।उनके गाने की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वह है उनकी बंदिश की अदायगी।जब भी मैं उनके द्वारा गाये भजन जैसे-"हम तुम्हें देख नंदलाल जिया करते हैं"या "दुःख हरो द्वारकानाथ" सुनता हूँ तो लगता है की कितने दिल से याद किया करते थे अपने श्याम को।ये भजनें महमहिमों के राज भवनों में गूंजा करती थीं तो चम्पानगर के किसी निर्धन की झोपडी भी इसकी साक्षी रह चुकी है।डा॰ज़ाकिर हूसेन,भारत के पूर्व राष्ट्रपति भी बाबा के गाने के क़ायल थे।महज ३२ वर्ष की आयु में उन्होंने अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन जो प्रयाग संगीत समिति द्वारा आयोजित था उसमें उन्होंने अध्यक्षता की।वहाँ पर उनके द्वारा दिया भाषण शास्त्रीय संगीत पर अदभुत बिवेचना है और इस विधा के विभिन्न आयामों पर उनकी सोच को रेखांकित करता है।उनकी संगीत की व्याख्या की समझ भी अदभुत थी।उस वक़्त के शायद ही कोई संगीतकार होगा जो इनके चम्पानगर स्थित आवास पर न आया होगा।वे जन्म से तो राजा थे ही किंतु अपने कर्मों से वो साधक थे।जिनके लिए श्याम ही आदि थे और श्याम ही अंत थे। वो मेरे बाबा थे,मेरे पिता के नाना थे इससे भी बड़ी बात वो एक संगीतकार थे,संगीत के पुजारी थे।गाने की जब मैंने शुरुआत की थी तब मेरे मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ ये थे। आज भी जब मैं गाता हूँ तो उनकी यह पंक्ति मेरे ज़ेहन में रहती है-"रूह से गाओ गले से नहीं"। उनको जितना सुना और उनके बारे में जितना सुना निसंदेह वे एक मानव नहीं बल्कि एक महा मानव थे।आज उनकी शताब्दी मनायी जा रही है और उनको मेरा सत्-सत् नमन।।

Tuesday, 19 July 2016

गुरु पूर्णिमा...

आज आषाढ़ मास की पूर्णिमा है और आज का दिन गुरुओं को समर्पित है।आज के दिन उनकी पूजा होती है। हाँ!आज दिन है गुरु पूर्णिमा का।सबसे पहले मैं उन सब को नमन करता हुँ जिनसे मैंने थोड़ा-बहुत भी कभी कुछ सीखा हो।
   गुरु पूर्णिमा का दिन तो मेरे लिए या कहिये उन सभों के लिए और भी ख़ास हो जाता जो गुरु-शिष्य परम्परा से संगीत,नृत्य या और भी किसी चीज़ की शिक्षा ले रहे हैं।
उस्ताद वसीम अहमद खान
   गु शब्द का अर्थ-अंधकार और रु शब्द का अर्थ-प्रकाश होता है।हाँ! गुरु वो होता है जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है,असत्य से सत्य की ओर ले जाता है।अब मैं अपनी बात करता हूँ।बात उस वक़्त की है जब मैं ४ वर्ष
श्री अमरनाथ झा
का था।उस वक़्त मुझे न बैठना आता था न ठीक से बोलना,उस समय मेरे गुरु जी श्री अमरनाथ झा ने मुझ में संगीत की समझ,राग-रागिनीयों की पहचान करवाई।और लय-ताल से भी मुझे अवगत करवाया।श्री अमरनाथ झा राजकुमार शायमानंद सिंह के शिष्य हैं।उनके गाने में सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वह उनकी बंदिश की आदयगी है जो सम्भवत: उन्होंने अपने गुरु से सीखी।आज जितनी भी संगीत मुझ में है निसंदेह उसकी नींव इन्होंने ही रखी और इसके लिए मैं सदा इनका आभारी रहूँगा।
    अब मैं बात करता हूँ उनकी जिनसे मैं अभी संगीत की शिक्षा ले रहा हूँ।हाँ! मैं बात कर रहा हुँ उस्ताद वसीम अहमद ख़ान की।अभी पिछले ही पोस्ट में मैंने उनके बारे में काफ़ी कुछ कहा।वो गुरु तो अच्छे हैं ही लेकिन साथ-साथ मुझे जो उनकी सबसे अच्छी बात लगती है वह है उनकी "व्यक्तित्व"।मुझे आज भी याद है जब मैंने उनसे तालीम लेनी शुरू ही की थी तब मैं ज़ोरदार बीमार पड़ा था,जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा था,तब उन्होंने मेरी कुशलता के लिए ख़ास नमाज़ अदा की।आज भी जब मैं उनसे तालीम लेने कोलकाता जाता हूँ तो संगीत सिखाने के साथ-साथ वो इस पर भी ध्यान देते की मेरे व्यक्तित्व का भी समग्र विकास हो।मेरे गुरु जी अच्छे कलाकार के साथ-साथ अच्छे गुरु भी हैं।उनका तालीम देने का तरीक़ा भी मुझे बहुत अच्छा लगता।
    मैंने काफ़ी कुछ कह दिया अपने गुरुओं पर।बातें तो इतनी हैं की कभी ख़त्म ना हो इसलिए और बातें फिर कभी।एक बार फिर गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मैं उन सब को प्रणाम करता हूँ जिनसे मैंने कुछ भी कभी भी सीखा हो।और अंत करूँगा मैं कबीर के इस दोहे से-
       " सब धरती काग़ज़ करूँ,
          लेखन बन रे
          साथ समुद्र की मास करूँ,
          गुरु गुण लिखा ना जाए।।"

Saturday, 16 July 2016

'जसराज' की 'जसरंगी'

मैंने बहुत सारी जुगलबंदीयाँ सुनी।चाहे वो उस्ताद राशिद खान और पंडित भीमसेन जोशी की हो या पंडित हरिप्रसाद चौरासिया और पंडित बालमुरलीकृष्ण की हो सब अपने आप में अदभुत थे।किंतु, आज मैं बात कर रहा हूँ एक ऐसे जुगलबंदी की जिसमें एक गायक और गायिका अलग अलग स्केल,अलग अलग राग गाते हुए जुगलबंदी करते।कई बार तो वे बिलकुल अलग शैली गाने वाले और अलग घराने के भी होते।जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ "जसरंगी" की।जसरंगी पं जसराज की एक अवधारणा है।जसरंगी पहेली बार पुणे में गाया गया था।जसरंगी को ले कर पंडित जी की यह सोच है की "हवा-पानी, धरती-गगन, राधा-कृष्ण, शिव-शक्ति सब दो अलग-अलग इकाई हैं। जब दोनों मिलते हैं तो पूर्णता आती है। ऐसे ही महिला-पुरुष स्वर एक साथ जुगलबंदी करें तो शायद पूर्णता आए।"इस सोच में पंडित जी सफल भी रहे क्योंकि आज जब कभी मैं या कोई भी संगीत-प्रेमी इस अदभुत जुगलबंदी को सुनता है तो एक अदभुत अनुभूति होती है।

      एक ने राग नट भैरव का चित्रण किया तो दूसरे ने राग माधवंती का।दोनों को एक साथ सुनकर एक अदभुत
आनंद मिल रहा था।एक मेवाती घराने से आते तो दूसरी जयपुर घराने से।ये दोनों एक साथ इतनी ख़ूबसूरती से गा रहे थे की ये एहसास भी नहीं हो रहा था कि दोनों अलग-अलग राग गा रहे थे।इतना ही नहीं दोनों अलग-अलग स्केल पर भी गा रहे थे और तो और दोनों को अलग-अलग संगतकार भी संगत कर रहे थे।जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ विधुषी अश्विनी भिड़े और पंडित संजीव अभ्यंकर की।गायन शुरू करने से पहले जानकारी देते हुए यह बताया की यह जुगलबंदी मूरछाना पद्धति पर आधारित है। 
  
    बाद मैं मैंने पं रतन मोहन शर्मा और गरगी सिद्धांत जी की जसरंगी जुगलबंदी सुनी।इन दोनों ने भी राग जोग और वृंदावनी सारंग का अनूठा मिलन किया है।
वैसे तो अभी ये नया प्रयोग है।देख़ये आगे यह कितना लोकप्रिय होता है संगीत रसिकों के बीच।
और भी चर्चा करूँगा संगीत पर लेकिन आज नहीं फिर कभी।।

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Music Has No Boundaries...

One thing which can’t be stopped from travelling to a different country without a visa or passport is- Art and Music. I will talk about ...