Monday, 11 July 2016

Perfection thy name is my Guru Jee-Ustad Waseem Ahmed Khan

Ustad Waseem AhmedKhan-my GuruJee, my mentor, my friend, my guide. I believe that I am the luckiest and most fortunate person because he accepted to teach little old me music from sa,re,ga,ma. My life has been greatly enriched by my association with him. 
           It was sometime in July few years back when my GuruJee was in Purnea, Bihar for his concert on the occasion of Late Rajkumar Shyamanand Singh's birth anniversary,that was the first time I heard him live. I was completely mesmerized by his singing though I didn't have much knowledge of sur, taal or ragas at that time. To add to the beauty of gayaki was the wonderful tabla accompaniment by the young maestro, Shri Sanjay Adhikari. My sincere thanks to my baba (Prof Balanand Sinha)

who insisted him to accept me as his disciple. I am privileged that he accepted me as his disciple. I often encountered with the word "PERFECTION" in my life. I didn't quite understand what it means to be perfect. It was only after I met my guru jee that I began understanding what it means or say what it means to be perfect. Here I would like to share one of my experiences with my GuruJee. He was giving me a talim of Raag Bhairav. He asked me sing a phrase of Raag bhairav during the course of aalap. The phrase was komal re, ga, ma. I was unable to sing the phrase as he wanted me to. To my surprise he made me sing the phrase for an hour or more until it was perfect up to some extent. 
            My GuruJee comes from the great lineage of Agra Gharana. He took his initial talim from his father Ustad Naseem Ahmed Khan and later by Ustad Shafi Ahmed Khan at ITC SRA. He has the previlage of being the maternal grandson of Ustad Ata Hussian Khan who is one of the all time great doyen of this gharana. The agra gharana is characterized by the forceful and loud projection of voice. Nom-tom aalap like dhrupad is a unique legacy of this gharana. Laay kari plays a major part in the agra style singing.  
        All the characteristics of this gharana can be seen in the singing of my GuruJee. And why shouldn't it be? He has got the Agra Gharana singing in his genes, inherited from his father and fore fathers. In the modern era of fusion and mixing, the word "puritan" can be used for my Guru Jee. He has performed in all major music festivals in India like-Saptak, Sawai Gandhrva Music Festival,Spic Macay International Convention etc, also he toured Germany, France Canada and Bangladesh for various music festivals. Wherever he has performed, he took the audience by storm and has kept them in awe stricken trance with his magical voice, vast knowledge and the masterly handling of various known and rare raagas. Currently he is a faculty at ITC SRA Kolkata. Yes, indeed I am fortunate that I got a guru like Ustad Waseem Ahmed Khan.

          


Saturday, 9 July 2016

कव्वाल साबरी से कैसी दुश्मनी?



२३ जून की सुबह अख़बार की इस ख़बर ने मुझे परेशान सा कर दिया।मैं विस्मित था,आहत था कि किसी कलाकार से, किसी संगीतज्ञ से किसी की कैसी बैर?

      संगीत कला तो ईश्वर की इबादत है।वास्तव में संगीत ईश्वर के क़रीब जाने का एक माध्यम है। संगीत कला का कोई सरहद नहीं होती है। इसे जाति, धर्म, देश, क्षेत्र में नहीं बांधा जा सकता।संगीत तो नदी की धारा की तरह अविरल है।यह तो आत्मा से परमात्मा तक पहुँचने का एक ज़रिया है।संगीत एक एक जुनून है,एक सुकून है और क़व्वाली तो सूफ़ी संतों की गायन की एक शैली है।

शुरूआत में तो क़व्वाली सिर्फ़ दरगाहों पर गाया जाता था पर आज यह साबरी बंधु जैसे गायकों के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
 फिर क्यों किसी ने अमजद साबरी जैसे अल्लाह के बंदे की आवाज़ से दुनिया भर के लोगों को महरूम कर दिया? भर दो झोली मेरी या मुहम्मद..., ताजदार-ए-हरम...और मेरा कोई नहीं है तेरे सिवा...जैसी जुबां पर चढ़ी कव्वालियां इन्हीं साबरी
बंधुओं की देन है।अब ये आवाज़ फिर नहीं सुनाई देगी क्योंकि किसी ने अमजद साबरी की गोली मार कर हत्या कर दी है।अमजद साबरी मशहूर कव्वाल गुलाम फरीद साबरी के बेटे थे।सूफ़ियाना क़व्वाली के लिए जाने जाते थे साबरी।इन्होंने अपने पिता से ही गाने की तालीम ली थी।अमजद "साबरी ब्रदसॅ" के नाम से मशहूर पाकिस्तानी क़व्वाल घराने से ताल्लुक़ रखते थे।संगीत तो इन्हें विरासत में मिला और इन्होंने बड़े बख़ूबी इसे आगे पहुँचाया।संगीत की ख़िदमत इनका एक मात्र मिशन था।अमजद साबरी मशहूर कव्वाली गायक मकबूल साबरी के भांजे थे, जिनकी 2011 में मौत हो गई थी।मुझे तो ऐसा लगता इनका पूरा परिवार ही संगीत को समर्पित था।इन्होंने ने भारत और पाकिस्तान के अलावा यूरोप और अमेरिका में भी कई कार्यक्रम किए थे। उन्हें गायिकी की आधुनिक शैली के लिए कव्वाली का ‘‘रॉकस्टार’’ भी कहा जाता था।
साबरी अब भले ही हमारे बीच न रहे किंतु वो अपने क़व्वालियों के ज़रिए सदा हमारे दिल में रहेंगे।आज जब उनके द्वारा गाये गए क़व्वालियों को सुन रहा तो लगा की सच-मुच वे कितने दिल को अल्लाह को याद किया करते थे।।

Friday, 1 July 2016

मन में बस गया... "भारत भवन"

मैं झील के किनारे बैठा हुआ हूँ।ठंडी-ठंडी हवा चल रही है और चारों ओर हरे-भरे पेड़।वातावरण में एक अजीब सी शांति और शकुन का एहसास हो रहा है।धीमी आवाज़ में सितार पर राग यमन की अलाप कानों में आ रही है।
एक ऐसी जगह जहाँ कला के हर प्रकार का वास है।ऐसी जगह जहाँ साहित्य भी है, जहाँ संगीत भी है।जहाँ नृत्य भी है, पेंटिंग भी है।जहाँ थियेटर भी है सिनेमा भी है।कहीं पंडित जसराज की मधुर आवाज़ भी गूँजती तो कहीं कथक की थिरकन तो कहीं भरतनाट्यम् की भाव का अहसास होता है।पांडवानी के रूप तीजन बाई की भी
उपस्थिति का अहसास है यहाँ पर।जहाँ कलाकारों की कला-कृतियाँ मन को अभिभूत कर रहीं है तो जहाँ जन-जन के कवि बाबा नागार्जुन की पंक्तियाँ भी सुनाई दे रही है।जी हाँ बात कर रहा हूँ मैं भोपाल में स्थित भारत भवन की।ये जगह मेरे लिए किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है।जैसे जैसे मैं इस प्रांगन में घूम रहा हूँ वैसे-वैसे मुझे कई कलाकारों,कवियों,लेखकों,रंगकर्मियों की सुखद अहसास और अनुभूति हो रही है।
सबसे पहले मैं "रूपानकर" पहुँचा।ये भारत भवन का एक अंग है जो की माडर्न,लोक और जन-जातीय कला-कृत्यों का एक संग्रहालय है।इस संग्रहालय में कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय प्रदर्शनी हो चुकें हैं अभी तक।जे स्वामिनाथम,के जी सुब्रमणीयम,हेन्री मोरे जैसे कई कलाकारों के प्रदर्शनी यहाँ आयोजित किए जा चुके हैं।
इसके बाद मैंने भारत भवन का रंगमंच पहुँचा-"रंगमण्डल"।यह रंगमंच नाटक जैसे कला,जो की लोगों के बीच से विलुप्त हो चुका है,को संजों कर रखने में एक बहुत बड़ा योगदान दे रहा है।१००० कार्यक्रम और ५० से भी ज़्यादा नाटकों के मंचन का साक्षी रह चुका है यह रंगमंच।पीटर ब्रुक,निरंजन गोस्वामी,तापस सेन जैसे कई दिग्गज यहाँ अपनी प्रस्तुति दे कर लोगों को अभिभूत कर चुके हैं।यहाँ समकालीन लेखकों के नाटकों की  भी
प्रस्तुति होती है तो सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ नाटकों का भी मंचन होता ही है।
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी,बाबा नागार्जुन,शमशेर सिंह बहादुर जैसे कवियों के कविताओं में डूब गया है मन।जी हाँ मैं भारत भवन के भारतीय कवियों को समर्पित एक अंग "वगरथ" पहुँच चुका हूँ।१३००० से भी ज़्यादा कविताओं के पुस्तक से लैस, शायद ये अपने तरह का अकेला संग्रहालय होगा जहाँ इतने सारे कवियों की कविता किसी को एक जगह मिल सकती है।यहाँ पर कई बड़े कवियों और लेखकों के हस्त लिखित रचनायें भी रखी हुई हैं जो की अपने आप में अदभुत हैं।यहाँ पर कई बड़े कवि सम्मेलन का आयोजन होता ही रहता है।
अब मैं भारत भवन के उस अंग में आ पहुँचा हूँ जिसे देखने के लिए मैं सबसे ज़्यादा उत्सुक था।हाँ!! मैं पहुँच गया हूँ "अनहद"--यह भारतीय शास्त्रीय ,लोक और आदिवासी संगीत का केंद्र है।यहाँ कई प्रकार के संगीत सम्मेलन होते हैं जैसे-परम्परा,सप्तक आदि।अनहद अपने स्थापना से आज तक के गौरवमय यात्रा में कई दिग्गज कलाकारों की कला प्रस्तुति का साक्षी रह चुका है।चाहे वो पं जसराज हों या उस्ताद ज़ाकिर हूसेन या उस्ताद अल्लाह रखा हों या पं रविशंकर सभी के संगीत की गूँज सुनाई देती है यहाँ।अभी पिछले ही वर्ष यहाँ आगरा घराने पर एक संगीत गोष्ठी हुई था जिसमें मेरे गुरूजी उस्ताद वसीम अहमद खान को भी आमंत्रित किया गया था।
इसके बाद मैं "छवि" पहुँचा।यह भारत भवन का हाल में ही बना एक अंग है जो कि भारतीय सिनेमाओं के लिए एक केंद्र है।यहाँ पर कई राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल आयोजित किए जा चुके हैं।
बहुत दिनों से इच्छा थी भारत भवन देखने की।वो आज पूरी हो गयी।मुझे इतना कुछ देखने के बाद ऐसा लगता
की शायद भारत में कोई दूसरा भारत भवन नहीं होगा।
सच-मुच भारत भवन अपने भारत नाम को साकार करता है।भारत के विविधताओं को संजो कर रखने और उसे लोगों के बीच पहुँचाने का काम भारत भवन पिछले कई दशकों बख़ूबी करता आ रहा है और यह आज भी जारी है।किसी कला प्रेमी के लिए यह किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं।।


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Sunday, 19 June 2016

पूर्णिया से भोपाल, बस गीत और संगीत...

बहुत सारा शहर देख लिया,घूम लिया अपनी १७ वर्ष की उम्र में।कभी इलाज के चक्कर में तो कभी संगीत के क्रम में।
    इस बार भोपाल भी देख लिया-घूम लिया।पर इस बार न तो इलाज कारण था ना ही संगीत।पर इस बार तो गर्मी की छुट्टियों का आनंद ही एक मात्र कारण था।
     भोपाल शहर अपने-आप में अदभुत है।शांत,सुंदर झीलों का शहर भोपाल भारत के सुंदरतम शहरों में गिना जाता है।और हो भी क्यों ना? मध्य प्रदेश को भारत का ह्रदय कहा जाता है और भोपाल तो मध्य प्रदेश का ही ह्रदय है।भोपाल से १८० की.मी स्थित जहाँ उज्जैन है जो की हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है शिप्रा नदी के किनारे अवस्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।वहीं भोपाल में ताज-उल
झीलों के शहर का एक झील
मस्जिद है जो की भारत के सबसे विशाल मस्जिदों में से एक है। 
भोपाल शहर गंगा-यमुनी तहज़ीब का एक अनूठा उदाहरण है।
         भोपाल आज विश्व में एक और कारण से जाना जाता है और वह है ११८४ में अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव से लगभग बीस हजार लोग का मारा जाना।ये इतनी बड़ी दुर्घटना थी की इसका प्रभाव आज भी वायु प्रदूषण,जल प्रदूषण के रूप में जारी है।
  वैसे भोपाल शहर अपने पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता है।भोपाल से 28 किमी दूर स्थित भोजपुर जो की भगवान शिव को समर्पित भोजेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
  भोपाल स्थित भारत भवन के बारे में तो क्या कहूँ? साहित्य, कला और संगीत का अदभुत संगम यहाँ किसी को देखने को मिल सकता है।भारत भवन पर विस्तृत बात-चीत अगली बार करूँगा।
  भोपाल स्थित जन-जातिये (tribal museam)संग्रहालय
एक अनोखा फ़्यूज़न है माडर्न आर्ट और जन-जातीये आर्ट का।कोई यह संग्रहालय
देख ले तो उसे जन-जातियों के रहन-सहन, उनके खान-पान,और उनके सांस्कृतिक विरासत की अदभुत झलक देखने को मिलती है।
जन जातियों की संगीत
जन-जातियों के खेलों के बारे में काफ़ी कुछ जानने को मिला।रक्कु,पिटटो,क़ुस्ती,मछली पकड़ने के खेल आदि कई जन-जातीय खेलों के बारे में जानने को मिला।मेघनाध खम्भ जो की जो की भिल समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है यह खम्भ मेघनाद पूजा में भीलों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।उसकी भी एक कला-कृति मुझे यहाँ देखने को मिली।इन जन-जातियों से जुड़ी हुई अदभुत सांस्कृतिक और कलात्मक पहलुओं को सहज-सँवार कर रखने की जरुवत है जो की यह संग्रहालय बख़ूबी कर रहा है और हम जैसे लोगों को इस सब के बारे में अवगत करा रहा है।

  संगीत के बिना तो मेरी हर यात्रा अधूरी रहती है। उज्जैन जाने के रास्ते में मैं देवास से गुज़रा।ये वही जगह है जिसने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक दिग्गज संगीतकार दिया।जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ पं कुमार गंधर्व की।उन्होंने अपनी गाने की एक अलग ही शैली बना ली थी जिसके कारण वे कई बार विवादों में भी पड़े किंतु उनका ऐसा मानना था की वो एक रूढ़िवादी हैं और कुछ नया करना चाहते थे और इसी कारण उन्होंने कभी भी किसी घराने को नहीं अपनाया।इन्होंने अपनी संगीत की शिक्षा पं बी॰आर डेओढ़र से ली थी।पंडित जी एक अदभुत गायक तो थे की किंतु
ध्रुपद केंद्र की दीवार से
 उसके साथ-साथ वे एक म्यूज़िकॉलॉजिस्ट भी थे।पंडित जी ने ख़याल के साथ- साथ निर्गुण भजन,लोक गीत आदि भी अपने शैली में गा कर लोगों को अभिभूत किया है।इन्हें १९८८ में पद्मा भूषण और १९९० में पद्मा विभूषण से नवाज़ा गया है।इन्होंने राग गांधी-मल्हार की रचना भी की है जिसे इन्होंने पहली बार महात्मा गांधी के शताब्दी वर्ष पर आयोजित एक कार्यक्रम में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में लोगों के सामने गाया था।इतना कुछ पढ़ने के बाद पंडित जी की आवाज़ में "उड़ जाएगा हंस अकेला" सुना तो अदभुत रुहानियत का एहसास हुआ।पंडित जी की अनोखी गायकी और बुलंद आवाज़ के बारे में तो क्या कहूँ! लीजिए मैं पंडित जी पे काफ़ी कुछ बोल गया।फिर मैं घूमते घूमते  ध्रुपद के गुरुकुल "ध्रुपद केंद्र" आ पहुँचा।ये संस्थान गुंडेचा बंधु द्वारा स्थापित १९८१ में की गयी थी।तब ये आज तक यहाँ गुंडेचा बंधु ने कई लोगों को गुरु-शिष्य परम्परा से ध्रुपद की तालीम दी है।भारत के साथ-साथ युरप के भी कई लोग यहाँ ध्रुपद की तालीम लेने आते हैं।

  और मेरी भोपाल यात्रा का अंत गुंडेचा बंधु के माता-पिता से भेंट के साथ हुआ।"सुनता है गुरु ज्ञानी" गुंडेचा बंधु की लिखी हुई ये किताब लेने के लिए मैं गुंडेचा बंधु के भोपाल स्थित आवास पर गया था जहाँ मेरी मुलाक़ात उनके माता-पिता से हुई।उनलोगों को देख कर आश्चर्य हुआ इतने बड़े दिग्गजों का घर और इतने सरल और सहज लोग!
  इस प्रकार मेरी भोपाल यात्रा का सुखद अंत हुआ।काफ़ी कुछ देखने-जानने को मिला मुझे भोपाल शहर को देखने पर।।



Tuesday, 7 June 2016

वर्षा ऋतु के रंग मल्हार के संग...

लोग कहते कि जब मियाँ तानसेन राग दीपक गाया करते थे तो दीपक प्रज्वलित होने लगती थी।जब वो राग मल्हार गाया करते थे तो बारिश होने लगती थी।मुझे ये तो नहीं पता कि ऐसा होता था या नहीं किंतु मैं अपने छोटे से संगीत के अनुभव से इतना ज़रूर कह सकता कि अगर आप ऐसा कोई राग किसी दिग्गज की आवाज़ में सुनें तो निश्चित आपको ऐसा लगेगा की दीये जल उठें हों या बारिश हो रही हो।मैं ऐसा बिलकुल नहीं कह रहा की सच-मुच की आग या पानी आपको देखेगी किंतु आपको ऐसा अहसास ज़रूर होगा।
   आज की ही बात ले लीजिए।मैं घर पर बैठकर आज उस्ताद राशिद खान साहब की राग मल्हार सुन रहा था।मुझे विश्वास है जब राशिद खान साहब "बिज़री चमके बरसे" गा रहें होंगे तो उनके मन में निश्चित ही बरसात वाली दिन का पूरा चित्रण होगा।उस राग के कुछ देर बजने के बाद वातावरण में एक अ
उस्ताद राशिद खान
दभुत ठंडक की अनुभूति होने लगी, ऐसा अहसास जैसे अभी कुछ की देर पहले ज़ोरों की बारिश हुई हो। राग मल्हार तो अपने आप में ही बड़ा मधुर और गम्भीर वातावरण पैदा करने वाला राग है, वो भी उस्ताद जी की अदभुत अदायगी इस राग की मधुरता पर चार चाँद लगा रहे थे।राशिद खान साहब रामपुर सहस्वान घराने से आते और इन्होंने अपनी संगीत की तालीम कई दिग्गज कलाकारों से ली है उनमें से उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खान और उस्ताद निशार हूसेन खान प्रमुख हैं।इनकी गायकी के लिए इन्हें पद्मा श्री और भी कई पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।लीजिए मैं राग मल्हार की बात करता-करता उस्ताद जी की बात करने लगा।किंतु आज चर्चा सिर्फ़ और सिर्फ़ राग मल्हार पर उस्ताद जी की बातें फिर कभी।
   तो आइए आज बात करते हैं राग मल्हार की उसकी विशेषताओं की।सुखद संयोग तो देखिये अब जब लोगों को मानसून की पहली झमा-झम बारिश का इंतज़ार है तो ऐसे मैं राग मल्हार की चर्चा तो बनती ही बनती है।
उस्ताद शफ़ी अहमद खान
यह राग हिंदुस्तानी के साथ -साथ कर्नाटिक संगीत में भी गाया जाता है।मधायामावती, नाम से जाना जाता है यह राग कर्नाटिक शैली में।एक बहुत ही ख़ास बात मैं बताना चाहूँगा यहाँ-हमारा राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' भी राग मल्हार में ही गाया गया है।अभी मैं कोलकाता प्रवास कर रहा हूँ और अपने गुरूजी, आगरा घराने के उस्ताद वसीम अहमद खान से तालीम लेने के क्रम में।मौसम ख़ुशनुमा है और बातों बातों में बात राग मल्हार पर चली तो गुरूजी ने उसके बारे में काफ़ी कुछ बतलाया।रामदासि मल्हार,सूरदासि मल्हार,मेघ मल्हार कुछ मल्हार के ऐसे प्रकार हैं जो की काफ़ी प्रसिद्ध हैं इस अदभुत घराना का।मैं यहाँ पर विशेषकर ये बताना चाहूँगा की राग मेघ मल्हार विशेषकर आगरा घराने के गायकों द्वारा गाया जाता है बाक़ी घरानों में इस राग को राग मेघ के नाम से गाया जाता।अगर राग मल्हार की आलपचारी आगरा घराने वालों की हो तो फिर तो क्या कहने! बंदिश की ख़ूबसूरती और भी बढ़ जाती।इतने में गुरुजी ने आगरा घराने की एक ख़ास बंदिश अपनी दमदार आवाज़ में गुन-गुनायी "रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे"-(यह बंदिश उनके गुरूजी उस्ताद शफ़ी अहमद खान साहब द्वारा रचित है)तो चारों ओर बादल ऐसे आ गाये जैसे यह बंदिश उनके लिए आमंत्रण हो।"आए आती धूम धाम" उस्ताद फ़ैयाज़ खान साहब की बहुत ही लोकप्रिय बंदिश है राग मेघ मल्हार में है।
   अब बात करते हैं ग्वालियर घराने की।ग्वालियर घराने की संगीत परम्परा तो सदियों पुरानी है।राजा मानसिंह तोमर या उससे पहले से ही चली आ रही इस घराने ने कई नायाब संगीतकार दिए हमारे देश को।बैजू बावरा, कर्ण और महमूद जैसे दिग्गज इसी घराने से आते।इन तीनों ने हमें एक नई प्रकार की मल्हार दी जो की बिक्शु की मल्हार, धोन्डिया की मल्हार और चाजू की मल्हार के नाम से मशहूर हुई।  ग्वालियर घराने के उस्ताद अब्दुल रशीद ख़ान की आवाज़ में राग ग़ौड मल्हार में "बादर बरसवे बरसात" से मन को एक ग़ज़ब की अनुभूति हुई।इस महान संगीतकार के तो बारे में क्या कहूँ।अपनी १०८ वर्ष की गौरवमयी जीवन में ४००० ठुमरियों से भी ज़्यादा ठुमरियाँ रची है इन्होंने जिसके कारण इन्हें रसन पिया के नाम से भी जाना जाता।
पं अजय चक्रबर्ती

           मेरी इस राग में और रुचि बढ़ी तो ढूँढते ढूँढते  मैं पटियाला घराने के पंडित अजय चक्रवर्ती की मधुर आवाज़ में राग मल्हार के झपताल में गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’ और उसके बाद द्रुत लय तीनताल में निबद्ध पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष की रचना- ‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’ तक पहुँच गया।सच मुच वातावरण में एक बरसात की ठंडक की एहसास होने लगी इन दोनों की आवाज़ सुन कर।

राग मल्हार तो ऐसा राग है जिसपे जितनी चर्चा की जाए कभी ख़त्म ही ना हो।आगे मिलेंगे और राग मल्हार के प्रकार और उनमें कुछ ख़ास बंदिशों पर चर्चा करेंगे। अभी तो वर्षा ऋतु की आगाज ही हुई है।













Tuesday, 31 May 2016

एक शाम बस संगीत के नाम....

विदुषी किशोरी अमोनकर
परीक्षा ख़त्म हो चुकी है और लम्बी छुट्टियों की आगज हो चुकी है।अब पढ़ाई का कोई बोझ नहीं,कोई तनाव नहीं।आज ना तो मुझे पापा को पढ़ाई की हिसाब देने की जरुरत है और न मम्मी की ये आवाज़ आने की डर की पढ़ाई करने बैठो।आज शाम तो बस शास्त्रीय संगीत के राग-रागनियों का आनंद लेने का होता है। उनमें डूबने का होता है।
                 संध्या बेला है तो शुरुआत तो राग यमन से ही होनी है। वो भी विदुषी किशोरी अमोनकर की आवाज़ में।पद्मा विभूषण किशोरी अमोनकर जी जयपुर घराने से आती हैं।इस घराने में गमक वाली तानें और मींड के साथ अलाप ख़ासियत है।वाह! क्या अदभुत,मधुर,सुरीली आवाज़ है विदुषी किशोरी अमोनकर जी की ।कोई भी सुने तो बस सुनता ही रह जाए। राग यमन के बारे में तो ऐसा कहा जाता की किसी गायक की गायकी का पता उसके राग यमन की अदायगी से चल सकताहै राग यमन की सम्पूर्ण अदाएगी वो भी" सखी ऐरी आली पिया बिन " जैसी बंदिश,  किशोरी  अमोनकर जी की आवाज़ में हो तो इससे बेहतर शाम की शुरुआत क्या हो सकतीहै।किशोरी अमोनकर जी ने अपनी संगीत की शिक्षा भेंडि बाज़ार घराने के अंजनीबाई मलपेकर जी से ली हैं।इनकी आवाज़ तो ऐसी की फ़िल्मी दुनिया भी इनकी आवाज़ से अछूती न रही।१९६४ की फ़िल्म गीत गाया पत्थरों ने और १९९० की फ़िल्म दृष्टि में इन्होंने गाने गाये हैं जो कि आज भी काफ़ी लोकप्रिय हैं।
      अगली बारी भी आती जयपुर घराने की ही विदुषी अश्विनी भिड़े की ।ओह! इनकी दिव्य आवाज़ की तो क्या कहने।राग बागेश्वरी बहुत जंच रहा था इनकी आवाज़ में।वैसे इनकी गायकी में कुछ हद तक मेवाती और किराना घराने की गायकी की छाप आती इस कारण इनकी गायकी का की एक अलग की शैली है।इन्होंने
विदुषी अश्विनी भिड़े
अपनी संगीत की शिक्षा जयपुर घराने के पंडित रत्नाकर पाई से ली है।अपनी गायकी और मधुर आवाज़ के बदौलत इन्होंने कई बड़े संगीत समारोहों में अपनी गायन से लोगों को अभिभूत किया है।राग बागेश्वरी का विरह और श्रृंगार  रस को विलंबित एकताल में "कौन गत भई" और द्रुत में "ऐरी माई साजन नहीं आए"जैसी बंदिशों में अदभुत रूप से पेश  किया है इन्होंने।

शाम को और आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं राग जयजयवंती की ओर वो भी बनारस घराने के पंडित राजन साजन मिश्र की आवाज़ में।
बनारस घराने की तो ख़ासियत ऐसी की उत्तर भारतीय लोक संगीत की छाप भी  दिखायी देती इसमें।इन दोनों की आवाज़ इतनी मीठी की कोई भी इन दोनों के आवाज़ से अभिभूत हो जाए।चाहे इनकी आवाज़ में ख़याल हो या हो ठुमरी या टप्पा या तराना सब में लगता जैसे इन दोनों को महारथ हासिल हो।इनको इनकी अदभुत
पंडित राजन साजन मिश्र
गायकी के लिए पद्मा भूषण से भी नवाज़ा जा चुका है।राग जयजयवंती,जिसे अक्सर लोग एक जटिल राग के रूप में देखते पर इनकी आवाज़ में "ऐसों नवल लाड़ली राधा"।सच मुच कितने दिल से गाते ये दोनों बनारस घराने के दिग्गज। 


ऐसी किसी की चाहत न होगी कि ऐसी शाम का अंत हो।संगीत तो ऐसी होती की इसको जितना सुनो उतना और सुनने का मन करता,उतना और डूबने का मन करता।
फिर मिलते हैं और चर्चा करते हैं संगीत पर।।


Sunday, 29 May 2016

Music with divinity.....Carnatic Music

Vidhushi MS Subbulakhshmi
 I was in vellore for my check-ups. This time the place felt much familiar to me. Moreover, it was my sixth visit to this place and I just hoped that it would be the last one.
      One thing which attracts me the most in the southern part is their temples. The religious, serene, musical environment of the temples just attracts me the most. The temples and the sweet, melodious carnatic music being played at a low volume make the environment perfect to take someone in a musical trance. The magical voice of the Carnatic singers keeps the listeners in a awe stricken trance. The famous Kanchi Kailasanathar temple in Kanchipuram is considered one of the oldest structures, the temple is dedicated to Lord Shiva.The credit of the building of this temple has been given to the rulers of the Pallava dynasty.The temple has a beautiful structure to look at. To add to the beauty of temple is the low volume played Carnatic music.I heard a Shiva bhajan in some sweet, divine and melodious voice.
 The voice was mesmerizing and had magnetic power in it which was attracting me. Later I found out the voice was of no other but of Bharat ratna MS Subbulakhshmi. I had heard Carnatic music quite a few times in past but it had not fascinated me the way it did this time.MS Subbulakhshmi is considered one of the finest vocalists India has ever produced. She is the first musician to be conferred by the Bharat Ratna in the field of music. Awarded with a numerous other awards she holds the pride of getting the prestigious Ramon Magsaysay Award, which is considered as the Nobel Prize of Asia. The mastery of her presenting the ragas and the bhajans has made a lot of people the fan of her pristine voice.
This incident has made a Hindustani classical music lover a permanent Carnatic Classical music lover too.
Mridangam
Later, I got an opportunity to listen to some of the prominent doyens of Carnatic Music like-Vidhushi Karaikudi Mani and Vidwan TN Krishanan. The aura, the atmosphere created by this music is such that it cannot be explained in words. The five modern states of India-Andhra Pradesh, Telangana, Karnataka, Kerala and Tamil Nadu are the states; this music is roughly confined to. The reasons for the differentiation between North, and South Indian music are not clear. After a lot of thinking and reading about this I concluded that the difference in the music just represents the fundamental cultural difference between two distinct geographical areas. Numerous musicians and composers have enriched the tradition of this music. Some notable personalities were; Papanasam Shivan, Gopala Krishna Bharati, Swati Tirunal, Mysore Vasudevachar, Narayan Tirtha, Uttukadu Venkatasubbair, Arunagiri Nathar, and Annamacharya. Vocal music forms the basis of South Indian music.  Although there is a rich instrumental tradition that uses vina, venu and violin, they revolve around instrumental renditions of vocal forms. Like tabla in
Pt M Balamurali Krishna
Hindustani Classical Music performances, Mridangam is the main instrument that provide rhythm and ragga to Carnatic Music performances. Pt M Balamurali Krishna is one of the leading vocalist of the current generation.He has been conferred by Padma Vibhushan for his contributions towards the Indian Art.I often heard him in jugalbandis with prominent musicians like- Pt Bhimsen Joshi,Pt Hariprasad Chaurasia.Whenever I heard these jugalbandis or say the jugalbandi of Hindustani Music and Carnatic Music makes me a greater fan of both the music forms.


Someone has correctly said- "Carnatic music is synonym to salvation and eternity."


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Music Has No Boundaries...

One thing which can’t be stopped from travelling to a different country without a visa or passport is- Art and Music. I will talk about ...